मन् तलाशै चैन(मन्–Heart♥️)

चल मना् चल मौझा करचै।

चलचै ठण्डै ठण्डै देश।

छोड छैआपे माया दे।

हुण बदली लैचै भेष।

सुख दुख दी दुनिया कच्छा ।

दूर बडी गै दूर जित्थै…

नी ओवै कपट ये उत्थै।

नी ओवै कष्टकलेश।

तू मना् हुण मनमानी दा।

करी दे बन्द निवेश।

चल मना् चल मौजां करचै।

चलचै ठण्डै ठण्डै देश।

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मन मन्ना् गल्ल मनी लै मेरी।

ऐ जीवन रास नी आवै।

झुठा ऐै संसार गै सारा।

झुठ्ठी ऐदी रीत।

पीड कलेजै उठदी डाडी।

झुठी ऐदी चाह झुठी ऐै प्रीत।

मना तेरी खातिर कोई बनेया ऐै योगी

कोई बनेया ठग ,बैरागी कोई बनेया भोगी।

तेरे खेल निराले दी नियूं कोई रीस।

मन भाम्बरा करदा सैर सपाटे।

नित धैयाडै बदली बदली भेष।

चल मना् चल मौजा करचै।

चलचै ठण्डै ठण्डै देश।

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सुखने कच्छा बद्द नी “मदन”माया दा संसार।

हर कोई कुछै दा करदा ऐै ब्यापार।

मेरी मेरी पेई दी डाडी नेई जाने पीड पराई।

झुठी नगरी,झुठी काया झुठा ऐै प्यार।

चल त्यागी सब किस यारा।

ऐ नगरी ,ऐ महल चुबारे सब छजे बाजार।

दूर पहाडे दी धारे,रूखें दी ठण्डी छां।

कल कल बगदे झरने,छम छम शुद्द हवा।

चेता नी आवै कोई जित्थै

शहर ग्रां।

रौंसली रौंसली हवा दे झोंके।

कटी लै अमन सुखै कन्नै बची बरेस।

चल मना् चल मौजा़ करचै।

चलचै ठण्डै ठण्डै देश।

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रफ्ताँ रफ्ताँ छिकुडती बहार👌👌👌

थम गया कारबाँ थम चुकी रफ्तार।

रफ्ताँ रफ्ताँ छिकुडती बहार।

खुदा तेरी बसाई सुन्दर नगरी की।

दर्द भरी गुजं रही पुकार।

क्या दशा हुई आज आलम की।

चारों दिशाओं में मची आहाकार।

थम गया कारबाँ,थम चुकी रफ्तार।

रफ्ताँ रफ्ताँ छिकुडती बहार।।

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धरती सुलगती कराह रही असहाय बेदना से।

जीव अन्तिम स्वास में लुप्त होते चेतना से।

लीला है तूने कैसी रचाई संसार मैं।

कहीं जलजलें,कहीं तुफाँ कहीं वायरस,कहीं डुबे गरजते मेघना से।

शायद वो दिन करीब आ चुके अब तो।

एक नई सृष्टि, नई दृष्टी होगा नया अवतार।

थम गया कारबाँ, थम चुकी रफ्तार।

रफ्ताँ रफ्ताँ छिकुडती बहार।

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प्रत्येक नर नारी कैद हुऐ बन्द चारदीवारी में।

र्निदोष बेवश बक्त की निगाह की पहरेदारी में

सुनसान हुए गलियाँ गलियारे और चबूतरे।

तफडती रूहें बिखलाते शिशु बुखमरी में।

अग्रिम क्षण अत्यंत कठिन होगें सफर के।

कुच की बारी में लगें है सब कतार।

थम गया कारबाँ, थम चुकी रफ्तार।

रफ्ताँ रफ्ताँ छिकुडती बहार।

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बडती दुरियाँ,रिश्तों की गबाह हैं दुर्दशा की।

बयाँ करती कहानी संसार की दशा की।अभी थमा नहीं उमडता मेघा फिजाँ में।

अभी तो देखना है कितना दम हवा में।

तेरी खुदाई की मेहर पर टिकी हर सांस।

शुरू हुई तेरी छटनी,सज्ज चुका तेरा दरबार।

थम गया कारबाँ,थम चुकी रफ्तार।

रफ्ताँ रफ्ताँ छिकुडती बहार।

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“मदन”शामें सहर निहारतीं निगाहें तेरी ओर।

बेवश खमोश बन्द पडी तेरी दरगाहें।

कहीं बिस्वास ही न डगमगानें लगे तुझसे ।

कुछ सोच लो तूम भी कहीं लग न जाऐं बददुआएँ।

बहुत हो चुका रोक लो अब मत दो फटकार।

थम गया कारबाँ, थम चुकी रफ्तार।

रफ्ताँ रफ्ताँ छिकुडती बहार।

खुदा तेरी बसाई सुन्दर नगरी की।

दर्द भरी गुजं रही है पुकार।

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आँखें छलक जातीं हैं😭#####गजल#####

आज कल याद इतनी. तेरी जो आती है।पलकें बन्द करू तो आँखें छलक जाती हैं।दिल की दीवार पे तस्वीर टगीं जो तेरी।

आइने को निहारू रू-ब-रू चली आती है।

कितना भुलाना चाहा मगर भूल न पाती है।

आज कल याद इतनी तेरी जो आती है।

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तुम्हें फूलों की तरह था पाला मैने।

गुलशन की तरह सँभाला मैने।

तूने मेरा इतवार तो किया होता।

तुम्हें जाते हुए देख,पिया गमों का प्याला मैने।

अभी तो कितनी ही बसन्त काटी थी तूने।

आज कल याद इतनी तेरी जो आती है।

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ख्यालों में डूबे हुए सोचता रहता हुँ मैं।

तुम होते तो इन बहारों को संयोता रहता मैं।

यूँ कभी तिल-तिल जिया न जलता मेरा।

तेरी यादों के पटारे को खोजता रहता हूँ मैं।

सूरत नजर से हटती नहीं हिजर में समा जाती है।

आज कल याद इतनी तेरी जो आती है।

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तू फूल था अनखिला मेरे गुलशन का लहू

के कतरों से था सींचा मैंने।

लाखों मुसिबतों को झेला।जालिम हवाओं से था खींचा मैने।

तूझी से था ये संसार मेरा चलती थी तूझी से सांसें मेरी।

मुँह मोड कर तूम तो चल पडे,मुड के देखा न भीगा मेरा चेहरा तूने।

जानता हूँ तूं यहीं कहीं है,फिजाओं में महक तेरी जो छाती है।

आज कल याद तेरी जो इतनी मुझे आती है।

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नींद आती नहीं चैन भी आता नहीं।

“मदन “जो जाता है क्यों लोट पाता नहीं।

कौन सी दुनिया है ये अनोखी कहां पे है।

वो एक.झलक भी कभी दिखाता नहीं

तन तो सभँल जाऐ भी, दिल की हालत बदतर हो जाती है।

आज कल याद तेरीजो इतनी मूझे आती है।

पलकें बन्द करू तो आँखें छलक जाती हैं।………..(मदन सिहँ भाऊ)

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मैं बहुत परेशान हूँ##गजल##

मैं पहले ही परेशान हूँ,मूझे और परेशान न करो।

मेरी जिन्दगी उलझनों से है घिरी,इसे यूं तो बदनाम न करो।

उझडते रहा,लुटते रहा हर रोज मैं तो अब।

करो हैशान तूम, मूझ पर कोई हैशान न करो।

मैं पहले ही परेशान हुँ ,मूझे और परेशान न करो।

रात रात भर नींद न ले पाता हूँ कभी।

रीत सोने की फिर भी निभाता हूँ।

खुली आँखों से मैं सपने देखता हूँ

कोई देख न ले आसुओं को मेरे।

चेहरे को छुपाता हूँ।

तुम भी कभी मेरे महमान तो बनो।

मैं बहुत परेशान हुँ और परेशान न करो।

मेरे पास तो है सागर गहरा,मगर प्यासा मैं रहता हूँ।

सितम गैरों के नहीं अपनों के सहता हूँ।

अक्ष बहते हैं,रूखसारों को छु कर।

र्दद भरा मंजर आज मैं ब्याँ करता हूँ।

लोग मिलते हैं गुलोगुलदस्ते से तूम्हें।

मैं तो आसुओं की माला पिरो लाया हूँ।

कर लो कबुल तूम, मुझ पे मेहरबान न हो।

मैं बहुत परेशान हुँ मुझे और परेशान न करो।

दर्द जब दिल में उठता तूम्हें दिखाऊँ कैसे।

क्या क्या है मूझपे बीती,तुम्हें बताऊँ कैसे।

“मदन”हाले जिगर का अफसाना बन गया।

जिन्दगी बोझ लगती है इसे उठाऊँ कैसे।अपनी तो सोहरत बक्त ने मिटा दी है।

तूम भी आज इतना घुमान न करो।

मैं बहुत परेशान हुँ,मूझे और परेशान न करो।

मेरी जिन्दगी उलझनों से घिरी है,

इसे यू तो तूम बदनाम न करो।

मैं बहूत परेशान हुँ, मूझे और परेशान न करो……………….।(मदन सिहँ)

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तुम्हीं तो मेरे अपने थे।🌹

क्यों दूर हो तूम हम से।

क्यों.इतना मजबूर किया है।

तेरी तो याद बहुत आती है।

हम को बहुत तडफाती है।

तूम ही तो,मेरे अपने थे।

तूम्हीं से तो मेरे सपने थे।

तुम्हीं ही तो मेरे अपने थे।।

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सोचा था हम ने भी तो।

तुम्हीं मेरा जीवन हो।

तेरे साथ हम भी जीं लेगें।

अमृत न मिले तो भी…

जहर गम का हम पी लेंगे

मगर तूने साथ क्यों छोडा।

हम सब से मुहँ क्यों मोडा।

जन्मों के साथ तो रखने थे।

तुम्हीं से तो मेरे सपने थे।

तुम्हीं तो मेरे अपने थे

अपने थे तुम अपने थे….

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अपनी माँ के तूम ही तारे थे

पापा के बहुत प्यारे थे।

लाख छुपा लूँ मैं तो ।

आँसु हैं बहते जाऐं।

तेरी याद सताऐ जब जब।

देंखु मै तस्वीर तब तब।

मन मन हम रोतें हैं।

न दिन को न रात को सोते हैं।

लगा के जीगर से बहुत हम रोते हैं।

बस तेरा नाम ही जपने हैं ।

तुम्हीं से तो मेरे सपने हैं।

तूम ही तो मेरे अपने हो।

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उदास हुआ है मन तो।

कभी आके तो मिल जा रे।

चला कौन देश तू गया।

गुलशन में फिर से खिल जा रे।

यह आहें क्यों हम भरते हैं।

आऐ दुनिया में सब वो मरते हैं।

कोई बक्त होता तब तो।,

“मदन”वाली उम्र थी अब तो।

दिल तो दुखने ही दुखने हैं।

तुमहीं से तो मेरे सपने हैं।

तुम्हीं तो मेरे अपने हैं

अपने थे तुम अपने हो.।।।मदन।।।

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Wo Waqt Phir Kab Aayega 🌹वो बक्त फिर कब आऐगा।🤔🤔🤔

बच्चा बोला हे मम्मी।

इन सबने क्या किया है।

घर में छिपे हैं क्यों सारे।

अपना मुहँ क्यों ढक् लिया है।

चोरी तो किसी एक ने की होगी।

सारे चोर तो हो नहीं सकते।

मिलाते क्यों नहीं हाथ किसी से।

इतने तो डरपोक हो नहीं सकते।

रहते थे जो हर पल दौड-धुप में।

अब इतने तो कमजोर हो नहीं सकते।

कल जो सुबेरा टहला करते थे।

आज हो गई भोर क्यों नहीं वो उठते।

समझ नहीं मेरे कुछ भी आता।

तू ही मूझे समझा दे न।

क्यों सुनसान पडीं हैं सडकें।

क्यों यह सब बन्द बाजार हैं।

क्यों सुन्नी सुन्नी सी हैं गलियां चौराहे।

क्यों सुन्ने खेत खलिहान हैं।

क्यों तू मैया धोती है सब्जी।

जो अंकल से हम लेते हैं।

क्या इस में कोई जादू किया है।

जो अंकल हमें देते हैं।

पहले तो तू माँ ठण्डा मुझे खिलाती थी।

फिर क्यों अब मूझे गर्म दूध पिलाती हो।

ऐसा क्या हुआ क्यों घर में सब कैद हैं।

कहाँ गे सब डाक्टर,कहाँ गे वैद हैं।

कहाँ गई सब बिमारी,कहाँ गे सब रोग हैं।

क्यों बैठे घर में सब कर रहे योग हैं।

आज क्यों नहीं कोई जीवन खोता बिमारी से।

क्यों हैं डरते सब चिकित्सक की तीमारी से।

यह कैसा है समय आआ।

यह कैसा है मैया खेल।

अपनो से सब दूर हुए।

न हो रहा अपनो से मेल।

अब क्यों नहीं आते मेरे आंगन।

सब मेरे सखा एंव हमजोल।

जिन हाथों में माता मेरी

लगाती मैहन्दी. थी रहती।

अब हर पल क्यों सैनिटाइजर है मलती।

क्यों है हर एक के मुख में।

कोरोना,कोरोना,कोरोना,कोरोना

क्यों आज सारे शब्द खत्म हो गए।

क्यों चारों दिशाओं में पडा रोना।

क्यों इतने से लोग मर रहे।

क्यों जो हैं सब डर रहे।

अच्छा बक्त कब आएगा।

सारे मिलकर सब संग खेलेंगे।

वो बक्त फिर कब आऐगा।

वो बक्त फिर कब आऐगा

वो बक्त फिर कब आऐगा।।

🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔👩‍⚖️👩‍💼👩‍⚖️👩‍💼👩‍⚖️👩‍💼👩‍⚖️👩‍💼👩‍⚖️

🙏🏾नई नई सुबह🙏🏼

चहचहाने लगें जब परिन्दें।

छटने लगे जब अन्धेरा ।

नई नई सुबह का आगमन

हो नया नया सबेरा।

खुली हवाओं में महक ।

सुनहरी किरणों का बसेरा।

बादलों के झुरमट में।

झलकता सुरज का चेहरा।

चहचहाने लगें जब परिन्दें।

छटने लगे जब अन्धेरा।

💥💥💥💥💥💥💥💥💥

नई ऊमगें, नया जोश ।

आज है लेकिन दिल खमोश।

बन्द है सब चारदीवारी में।

वो वायदा कश,वो सरफरोश।

कहर खुदा का बरपा कैसा।

खो बैठा है अपना होश।

जीवन काल चक्र थम चुका।

थम चुका नर-नारी का घोष।

सांसों का कारबाँ हो चला पखेरा।

चहचहने लगें जब परिन्दें ।

छटने लगे जब अन्धेरा।

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दर्द छलकता आंखों से”मदन”

वहते आंसुओं का खुमार।

क्यों लुभा भी न पाऐं लताऐं

लदीं फुलों से बेशुमार।

तरछते ओस के वो कतरे।

करते कदमों का इन्तजार।

क्यों सुनसान हैं सडकें।

क्यों बन्द पडे बाजार।

है बेचैन क्यों आज ये सबेरा।

चहचहाने लगें जब परिन्दें।

छटने लगे जब अन्धेरा।

नई नई सुबह।

नया नया सबेरा ।

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