🌹अमन से रहना,तूम अब मेरे बच्चो🌹

जला दिया है चिराग अमन का हमने।

बरसों से थी तालाश जिसकी तूम सबको।

बन जाना रौशनी तूम सब इसकी।

महकना है गुलशन की तरह तूम सबको।।

जकड रखा था ज़जीरों में जिसको।

आजाद हो गुलामी से अब तूम सब।

अमन से रहना तूम अब मेरे बच्चो।

उडना खुली फिजाओं में मिलकर तूम सब।।

रो रही थी बिलख रही थी बरसों से धरती केसर की।

नोंच नोंच कर लूटी है अस्मित मिल कर इन सबने।

अब पीढा सहन से बाहर हो चुकी थी।

कर दिया है आजाद मिलकर हम सबने।।

मुट्ठी भर लोगों की खातिर थे मजबूर तुम।

आज मिटा दी हैं सब मजबूरियां हमने।

जगा् लो उमगें,फैला लो नन्हें पंख तुम सब।

छुना है गगन को मिलकर हम सबने।।

गुजेंगे सुफी कलाम अब फिर से।

लहराऐंगे परचम अमन के फिर से।

तैरेंगी नोका,चहचहाऐंगे पक्षी फिरसे।

मिटानी है र्दुगन्ध बरूद की,फैलानी है फूलों की खुशबू फिर से।।

हर जगह ,हर पल सुख हो चैन हो,अमन हो।

प्रेम की मधुर बेला हो,ढलते सुर्य की लालिमा हो।

मधूर सपने हों, हों सुन्दर ख्यालात पनपें हर पल।

फरिस्ते हों यहाँ अब, न कोई अब जालिम हो।।

बहुत कठिन था मगर जोश था मुझमें मेरे बच्चों।

अब मत डगमगाना कदम तुम अपने।

लगाके रखना गलें से तूम सबको।

संयोना है,सींचना है हरपल इसको।।

तूम शीश हो मानचित्र का इसे झुकने हम कैसे देगें।

तूझ बिन अधूरी अकृति,तेरी प्रगति रूकने हम कैसे देगें।

तेरे सीने को लहुँ से लथपत किया है इनकी नितियों ने।

तूझको नफरत की आग से फूंकने कैसे देगें।।

खोया है असंख्य बीरों को, दिया है वलिदान सबने।

बेअर्थ यह सब हम जाने कैसे देते “मदन”

बडी शिद्धत से बनाया है रब्ब ने तुझे।

दुल्हन की तरह तूझको सजाना है हम सबने।

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